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Depavali_Greetings_2014 [1 Attachment]

Pl find attachment of Deepavali Greetings.

Regards,

B.D.Vashishta
Director, Childline, Rupnagar (Punjab)
Chairman ASRA, Rupnagar (Punjab)
Member CWC, Rupnagar (Punjab)
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'तहरीर' के धरने और सूचना आयुक्तों को चुनौती देने से दबाब में आयी सरकार ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना आयुक्त के चयन के लिए बीते बृहस्पतिवार होने वाली बैठक स्थगित

Taken from Facebook Wall of Sanjay Sharma 

'तहरीर' के धरने और सूचना आयुक्तों को
चुनौती देने से दबाब में आयी सरकार ने
उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त
और 1 सूचना आयुक्त के चयन के लिए बीते
बृहस्पतिवार होने वाली बैठक स्थगित
कर दी है l 'तहरीर' के विरोध के चलते ही यह
बैठक इसके पहले भी एक बार स्थगित हो
चुकी है।

उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में
मुख्य सूचना आयुक्त और 1 सूचना
आयुक्तका पद 30 जून 2014 से खाली है। इससे
पहले सरकार ने इन दोनों पदों पर चयन के
लिए पहले 28 जून 2014 को चयन समिति की बैठक
बुलाई थी जिसमें बिना आवेदन के सीधे
चयन समिति द्वारा इन दोनों पदों पर
चयन की तैयारी थी जिसका हमारे द्वारा
कड़ा विरोध किया गया था और पूर्व की
भांति आवेदन मंगाने की मांग की गयी थी l
हमारे दबाब में यह बैठक
 स्थगित कर दी गई थी और प्रशासनिक सुधार
विभाग द्वारा बीते अगस्त में इन
दोनों पदों पर चयन के लिए आवेदन मांगे
गए थे l

लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन,
जबाबदेही निर्धारण और आमजन के
मानवाधिकारों के संरक्षण के
हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी
स्तर पर कार्यशील संस्था 'तहरीर'
द्वारा आरटीआई एक्ट की नौवीं
सालगिरह पर दिनांक 12 अक्टूबर 2014 को
राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान
धरना स्थल पर उत्तर प्रदेश राज्य
सूचना आयोग के निराशाजनक प्रदर्शन
के विरोध में धरना और यूपी के हालिया
कार्यरत 9 सूचना
 आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते
हुए उनको कैमरे के सामने एक्ट पर खुली
बहस की चुनौती के कार्यक्रम का आयोजन
येश्वर्याज सेवा संस्थान, एक्शन
ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन ,
आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी , ट्रैप
संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार
कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम,
मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद , जन
सूचना अधिकार जागरूकता
मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी
 मेमोरियल समाज सेवा संस्थान , आल
इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड
शैडयूल्ड ट्राइब्स एम्पलाइज
वेलफेयर एसोसिएशन, भागीदारी मंच,
सार्वजनिक जबाबदेही भारत निर्माण
मंच आदि संगठनों के साथ संयुक्त रूप
से किया गया l कार्यक्रम में
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया
लखनऊ चैप्टर, सोसाइटी फॉर फ़ास्ट
जस्टिस लखनऊ और उत्तर प्रदेश रोडवेज
संविदा कर्मचारी संघ ने भी तहरीर को
समर्थन प्रदान
 करते हुए शिरकत की थी l 'तहरीर' इन सभी
संगठनों को उनके सहयोग के लिए
धन्यवाद ज्ञापित करता है l इस सम्बन्ध
में ज्ञापन को जिला प्रशासन के
माध्यम से भेजने के साथ साथ हमारे
द्वारा सीधे उत्तर प्रदेश के
राज्यपाल महोदय को तथा भारत के मुख्य
न्यायाधीश को भी प्रेषित कर दिया गया
है जो इस स्टेटस के साथ अपलोड किया जा
रहा है l

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Posted by: urvashi sharma <rtimahilamanchup@...>
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उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के भाई के ससुर को सूचना आयुक्त नियुक्त करने का उदाहरण देते हुए सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद रोकने के लिए नियमों में संशोधन करने की याचिका सु =?u


 
 
सूचना आयोग में भाई-भतीजावाद रोकने की मांग
नई दिल्ली, श्याम सुमन
First Published:18-10-14 09:22 PM
Last Updated:18-10-14 09:22 PM
 
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के भाई के ससुर को सूचना आयुक्त नियुक्त करने का उदाहरण देते हुए सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद रोकने के लिए नियमों में संशोधन करने की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है।

लोक प्रहरी संगठन ने याचिका में कहा है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के नियमों में उम्मीदवारों के लिए सार्वजनिक जीवन में ‘ख्यातिलब्ध हस्ती’ की परिभाषा स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि इस श्रेणी के तहत सरकारें अपनी मर्जी के व्यक्तियों को सूचना आयुक्त बना रही हैं, जो न तो स्वतंत्र हैं और न ही निष्पक्ष। इस प्रक्रिया में पारदिर्शता है, क्योंकि शार्ट लिस्ट किए गए लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जाते।

लोकप्रहरी के संगठन के संयोजक तथा पूर्व आईएएस एसएन शुक्ला ने कहा कि याचिका में यूपी में हाल ही में आठ सूचना आयुक्त नियुक्त किए गए हैं, जिन्हें हाईकोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस बारे में कानून बना सकता है, क्योंकि सूचना के अधिकार कानून के तहत नियुक्तियों के बारे में नियम अब तक नहीं बनाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में तय कर चुका है कि जहां विधायिका ने कानून नहीं बनाया है, वहां नागरिकों के मौलिक अधिकारों को संरक्षित करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप से कानून बनाए जा सकते हैं।

याचिका में शुक्ला ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में ‘ख्यातिलब्ध हस्ती’ में सामाजिक कार्यो में पद्मभूषण या पद्मविभूषण, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त व्यक्तियों को रखना चाहिए। साथ ही उन्हें व्यापक ज्ञान और अनुभव भी होना चाहिए। यह योग्यता ऐसी हो जिसकी पुष्टि की जा सके।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एचएल दत्तू की पीठ इस याचिका पर 15 दिसंबर को सुनवाई करेगी। लोकप्रहरी की याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट गत वर्ष आपराधिक मामलों में दंडित जनप्रतिनिधियों को तुरंत प्रभाव से अयोग्य घोषित करने का फैसला दिया था।


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Posted by: urvashi sharma <rtimahilamanchup-/E1597aS9LQxFYw1CcD5bw@public.gmane.org>



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(unknown)




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Posted by: Sirish <sirish.in-Re5JQEeQqe8AvxtiuMwx3w@public.gmane.org>



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SP spent Rs 100 crore on airport at Mulayam's village, 'wasted money'

SP spent Rs 100 crore on airport at Mulayam's village, 'wasted money'

Sanjay Pandey, Lucknow, Oct 16,2014, DHNews Service:

Samajwadi Party governments have spent almost Rs 100 crore during its different tenures on the construction of a modern airport at Saifai, the native village of the SP supremo Mulayam Singh Yadav in Uttar Pradesh’s Etawah district, about 250 kilometres from here.

The revelation came in the reply to a query filed under the Right to Information Act (RTI) by a Lucknow based RTI activist Sanjay Sharma.

In his reply to the RTI query, Deepak Srivastava, the Principal Information Officer, Civil Aviation Directorate, said that Rs 9,249.42 lakh had been spent on the construction, beautification and renovation of Saifai airport so far.

On the query about the details of national and international flights arriving and departing from the airport, the official replied that there was no record available with the directorate in this regard.

The PIO also expressed his inability to furnish information about the earnings, if any, from the airport to the public exchequer from the airport saying that it was not available.

Citing Section 8 of RTI Act, Srivastava denied information related to UP Chief Minister Akhilesh Yadav’s flight details landing at and taking-off from Safai airport.

Sharma plans to file a second appeal to seek the same information.

“It is sheer wastage of the public money. Such a huge amount of money was wasted only to satisfy the ego of the ruling family. The common citizens of the state have not in any way benefitted from the airport,” Sharma told Deccan Herald on Thursday.

He said that it was really surprising that so much of money was “wasted” on a project which was not only “useless” but had not brought anything in return.

Sharma said that he would also be sending a memorandum to Governor of UP to take action against IAS officials who approved the project of Safai airport as it was not viable at all.

Saifai also has a modern sports stadium and a super specialty hospital.
The SP organises ‘Saifai Festival’ every year in which many Bollywood personalities take part.

SP spent Rs 100 crore on airport at Mulayam's village, 'wasted money'



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Posted by: urvashi sharma <rtimahilamanchup-/E1597aS9LQxFYw1CcD5bw@public.gmane.org>



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CIC autonomy gets dented due to missing chief




HT : Full Story  on link below::





CIC autonomy gets dented due to missing chief

Aloke Tikku, Hindustan Times  New Delhi, October 17, 2014

First Published: 13:40 IST(17/10/2014) | Last Updated: 14:14 IST(17/10/2014)


As a headless Central Information Commission (CIC) controversially celebrates nine years of the transparency law behind closed doors, there are indications that the CIC chief's absence has already dented the watchdog's autonomy. Being without a chief has placed the commission on a weak legal footing.


According to documents accessed under the RTI law, the government has taken control over the CIC's purse strings and placed them in the hands of department of personnel and training secretary (DoPT) Sanjay Kothari.


The move followed the vacancy in the chief information commissioner's post since 22 August and an SOS sent by the commission's secretary TY Das.


"In the absence of chief information commissioner, the financial powers... will be exercised by secretary (personnel)," the DoPT under secretary Sarita Nair said in a letter to the CIC last month.


The decision came on a request for an early decision from the CIC secretary, worried that the vacancy would bring work at the transparency watchdog to a grinding halt. Das had cautioned that the commission had been left with no administrative head "with the requisite administrative and financial powers".


"This is unfortunate," said RTI activist Lokesh Batra. "How does one expect the commission to function independently when it has to run to the civil service - whose cases it would be adjudicating - for everything," he said.


The post has been vacant since August 22 when Rajiv Mathur stepped down on completing his tenure. Unlike other laws, the RTI Act does not have any provision to temporarily designate any other commissioner as the chief.


Prominent RTI activists such as Anjali Bhardwaj have already spoken against the delay that had raised questions about the legal sanctity of the CIC's decisions.


A central information commissioner - speaking on condition of anonymity - said they had decided to hold a "brainstorming" session with their predecessors as a symbolic event. "We don't have a leader who can take decisions," he lamented.

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Posted by: Lokesh Batra <batra_lokesh-/E1597aS9LQAvxtiuMwx3w@public.gmane.org>



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HT: Headless CIC's autonomy, legal standing take a hit [1 Attachment]

You may like to read following news item :



"Headless CIC's autonomy, legal standing take a hit"

It was published on Page 15 in Hindustan Times (New Delhi) on October 16, 20014. 


To read story: Click on link below:




You may like to circulate it.. 


A pdf copy also attached.


Regards,

Commodore Lokesh Batra (Retd.) IN 1967
BringChangeNow

www.bringchangenow.org




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Posted by: Lokesh Batra <batra_lokesh-/E1597aS9LQAvxtiuMwx3w@public.gmane.org>



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GOI's Budget Circular for the Year 2015-16 and how RTI is trending in Public Sector Banks [1 Attachment]

Dear all,
The Finance Ministry has issued a circular giving the detailed procedure for all Ministries and Departments to follow while submitting their inputs for preparing the Annual Budget for the next financial year - 2015-16. Readers may access this 10th October circular on the Finance Ministry's website at: http://finmin.nic.in/the_ministry/dept_eco_affairs/budget/budgetcircular2015-16.pdf

While the contents of the circular are a bit difficult for a person like me untrained in the language and terminology of budget-making exercise, what the circular points to is the possibility of making representations to the concerned Ministry/ Department regarding sectoral allocation of funds. While the circular itself does not talk about any kind of public consultation in formulating the Demand for Grants for the next year, the officers tasked with preparing the expenditure estimates will work in isolation unless citizens start engaging with them from the very beginning to demand increased or more rational, realistic, sensible and just allocation of funds. Several activists and economists who support the right to work have made public statements criticising the proposed  change in the labour-non-labour component of the spending under the National Rural Employment Guarantee Act/Programme. This is the moment to take that message straight to the policymakers and the budget drafting officers so that the budget document reflects these demands,

The Budget has in recent years paid special attention to the development of women, children and citizens belonging to the Scheduled Castes, Scheduled Tribes and those living in Sikkim and the northeastern States of India. This is the moment to suggest changes, alterations and rationalisation in the concerned plan and non-plan schemes.

A frequent complaint of all citizens, activists and organisations tracking public expenditure is that every year a major portion of the development funds are allocated towards the end of the financial year leading to a rush to spend money. The current budget circular refers to a 'Monthly Expenditure Plan' that must be attached to all demands for grants by all ministries and departments. This plan along with the detailed demand for grants is required to be disclosed publicly on the official website of every Ministry/Department. RTI activists could choose one Ministry/Department to check compliance with this requirement and seek transparency and accountability in spending when the budget is approved next year by Parliament. This is the moment to plan such interventions by looking at what is already available on the websites of the concerned Ministries and Departments to be prepared for the next year's budgetary spending.


People's Interest in seeking information from Public Sector Banks seems to be Waning
The Right to Information Act (RTI Act) has entered the 10th year of implementation. A major study launched by RAAG-2 has shown that the transparency regime is shrinking due to neglect from the Governments, public authorities and the Information Commissions. Readers may access this report at: http://www.rti-assessment.com/raag---ces--rti-study-2011-13.html This is a worrisome development especially because, less than 1% of the citizenry is using the RTI Act every year to demand transparency and accountability across the country.

We did a rapid study of how RTI is trending in 20 public sector banks which are under the control of the Central Government. The findings are based on RTI statistics published in the Annual Reports of the Central Information Commission for the years 2012-13 and 2011-12. Comparable data for all 20 Banks is not available for earlier years. The data for 2013-14 is also not available as the CIC's Annual Report has not been released yet. Meanwhile our major findings of how RTI is trending in PSU Banks is given below (comparative table in in the attachment):

  • Only three Banks, namely, Bank of Maharashtra, State Bank of India and Bank of India, in that order, witnessed a rise in the number of RTI applications received in 2012-13 as compared to 2011-12. Of these Bank of Maharashtra recorded the highest increase at a little more than 25%.
  • In 17 Banks the number of requests has gone down appreciably in 2012-13 when compared with the numbers received during the previous year. The biggest decline in the number of RTI applications - more than 60% - was witnessed in UCO Bank. Union Bank of India, Central Bank of India and United Bank of India all witnessed more than 50% reduction in the number of RTI applications received in 2012-13 as compared to the figures of 2011-12.
  • When juxtaposed with the number of branches of each Bank, the average number of RTI applications per Branch was the highest in Allahabad Bank, UCO Bank and Bank of Baroda at 2 per year in 2011-12. 50% of the Banks received an average of less than 1 RTI application per branch that year. This figure dwindled further in 2012-13 with no Bank receiving even 2 RTI applications per branch.
  • However, the percentage of rejection of RTI applications witnessed a significant increase in 2012-13 as compared to the rate of rejection in 2011-12. The rejection rate more than doubled in Allahabad Bank, United Bank, UCO Bank and the Bank of Baroda in 2012-13. Corporation Bank which did not reject any RTI application in 2011-12, rejected more than a third of the RTI applications received in 2012-13. Rejection rates were lower in 2012-13 in the Bank of India, Indian Bank and Vijaya Bank as compared to the previous year.
  • Interestingly, the size of the non-performing assets (NPAs) does not always correspond to the trend of RTI applications received or rejected by Banks. Despite having the largest volume of NPA at the end of March 2013, both State Bank of India (top NPA grosser amongst the 20 Banks) and Bank of India (3rd largest amongst the 20 Banks) witnessed a slight growth in the number of RTI applications received and a slight decline in the percentage of RTI applications rejected in 2012-13 as compared to 2011-12. However, Punjab National Bank (2nd largest NPA volume amongst the 20 Banks), Central Bank, Bank of Baroda, Union Bank of India and UCO Bank witnessed a very high rejection rate coupled with a big reduction in the number of RTI applications during the same period. Bank of Maharashtra with the smallest volume of NPAs witnessed a 25% increase in the number of RTI applications received in 2012-13 but only a little more than 2% increase in the percentage of rejection of RTI applications.
Similar RTI data for 2013-14 has not been published by the CIC as its Annual Report is under compilation. We could not find the latest NPA figures for Banks as in March 2014 on the RBI website despite our best efforts. Nevertheless on the basis of available data for the last two years the overall trend is one of reduction in the number of RTI applications coming to public sector Banks. Fewer citizens are seeking information from these Banks through the RTI route. Despite the reduction in the number of requests, most of the Banks are rejecting more and more RTI applications than before. So by no stretch of imagination can it be said that the governance and the competitiveness of public sector Banks is constrained by the RTI Act as reported by the PJ Nayak Committee appointed by the Reserve Banks of India to look into the governance of boards of Banks in India (see report on the RBI website at: http://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/PublicationReport/Pdfs/BCF090514FR.pdf)

The Prime Minister's Jan-Dhan Yojana which is a country-wide exercise to bring millions of excluded families into the financial sector by opening bank accounts for them, creates a large clientele for banks. With inadequate preparation for dealing with such a large customer base as is being pointed out by several experts, will Banks start receiving more RTI applications in future? Time alone will tell. Meanwhile we will get back to you on how RTI has been trending in other Ministries and Departments in the Central Government, later this month.

Please circulate this email widely.

In order to access our previous email alerts on RTI and related issues please click on: http://www.humanrightsinitiative.org/index.php?option=com_content&view=article&id=65&Itemid=84  You will find the links at the top of this web page. If you do not wish to receive these email alerts please send an email to this address indicating your refusal.

Thanks
Venkatesh Nayak
Programme Coordinator
Access to Information Programme
Commonwealth Human Rights Initiative
#55 A, 3rd Floor, Siddhartha Chambers-1
Kalu Sarai
New Delhi- 110 016
Tel: +91-11-43120201/ 43180215
Fax: +91-11-26864688

The people of this country have a right to know every public act, everything, that is done in a public way, by their public functionaries. They are entitled to know the particulars of every public transaction in all its bearing": Justice K K Mathew, former Judge, Supreme Court of India, (1975)

"“Where a society has chosen to accept democracy as its credal faith, it is elementary that the citizens ought to know what their government is doing": Justice P N Bhagwati, former Chief Justice, Supreme Court of India, (1981)

"Information is the currency that every citizen requires to participate in the life and governance of society”: Justice A. P. Shah, former Chief Justice, Delhi and Madras High Courts, (2010)



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Feature on RTI that was published in HINDUSTAN titled "दस साल में निकला दम"

 
दस साल में निकला दम
फरजंद अहमद, पूर्व सूचना आयुक्त, बिहार
First Published:12-10-14 09:10 PM
Last Updated:12-10-14 09:10 PM


जाने-माने ब्रिटिश कवि और स्कॉलर रिचर्ड गारनेट ने एक बार कहा था कि हर परदे की ख्वाहिश होती है कि कोई उसे बेपरदा करे, सिवाय पाखंड के परदे का। पाखंड का परदा व्यवस्था के चेहरे से उठे या न उठे, मगर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने वालों के बीच फैलता खौफ और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता की गारंटी देने वाला सूचना अधिकार कानून खुद पाखंड के परदे के भीतर दम तोड़ रहा है। आज आरटीआई की दसवीं वर्षगांठ है, मगर पहली बार केंद्रीय सूचना आयोग में न तो कोई शिकवा-शिकायत करने वाला होगा और न ही सूचना का अधिकार, यानी सनशाइन कानून पर मंडराते स्याह बादलों पर कोई चर्चा होगी। केवल बंद कमरे में एक औपचारिकता पूरी की जाएगी, क्योंकि केंद्रीय सूचना आयोग में फिलहाल कोई मुख्य सूचना आयुक्त नहीं। पहले राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री इसका उद्घाटन करते थे और सरकार की नजर में इस कानून की कमजोरियों या उपलब्धि पर बहस की शुरुआत करते थे, लेकिन नई सरकार को इतनी फुरसत नहीं मिली कि वह मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त कर सके।

जो कानून अब तक जनता के हाथ में एक धारदार हथियार था, प्रजातंत्र के लिए ऑक्सीजन था, उस हथियार की धार दस वर्षों में ही कुंद हो चुकी है। सरकारें या प्रशासन हर आवेदक को शक की नजरों से देखते हैं, इसलिए लोक सूचना पदाधिकारी सूचना देने से कतराते हैं या फिर उन्हें दौड़ाते रहते हैं। नतीजा यह है कि वादों का अंबार आकाश छू रहा है। आवेदक अपनी अपील लेकर आयोग का चक्कर काटते-काटते थकते जा रहे हैं। युवा सामाजिक कार्यकर्ता उत्कर्ष सिन्हा को लगता है कि अब हर आवेदक राग दरबारी  का बेबस लंगड़ बनकर रह जाएगा, जिसने पूरी जिंदगी एक दस्तावेज की नकल के लिए गंवा दी थी। आरटीआई असेसमेंट और एडवोकेसी ग्रुप और समय-सेंटर फॉर इक्विटीज के अनुसार, आज सूचना आयोगों में करीब दो लाख वाद सुनवाई के लिए तरस रहे हैं। अध्ययन के अनुसार, मध्य प्रदेश में यदि आज कोई अपील दाखिल करता है, तो 60 साल बाद उसका नंबर आएगा। वहीं पश्चिम बंगाल में उसे 17 साल, राजस्थान में तीन साल, असम और केरल में दो साल इंतजार करना होगा। खुद केंद्रीय सूचना आयोग में 26,115 मामले लंबित हैं।

अध्ययन के अनुसार, सबसे अधिक मामले सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में लंबित हैं। इनकी संख्या 48,442 है, जबकि महाराष्ट्र सूचना मांगने वालों की हत्या और उत्पीड़न में पूरे देश में अव्वल नंबर पर है। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट इनीशिएटिव के अनुसार, महाराष्ट्र में अब तक 53 आवेदकों पर जानलेवा हमले हो चुके हैं, जिनमें नौ लोगों की जान जा चुकी है, जबकि बिहार में छह लोग सूचना मांगने के कारण मारे गए हैं। जाने-माने आरटीआई एक्टिविस्ट शिव प्रकाश राय (जिन्होंने सूचना मांगने के कारण झूठे मामले में कई महीने जेल में गुजारे थे) के अनुसार, बिहार में आवेदकों पर अब हमले कुछ कम इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि दहशत के कारण लोग सूचना मांगने के पहले कई बार सोचते हैं। महाराष्ट्र के बाद गुजरात का नंबर आता है, जहां 34 कार्यकर्ताओं पर हमले हो चुके हैं। उनमें से तीन मारे जा चुके हैं।

मगर उत्तर प्रदेश में सूचना की बदहाली नई मिसाल कायम कर रही है। यहां फिलहाल नौ सूचना आयुक्त हैं, जिनकी काबिलियत और उदासीनता पर चर्चा चल रही है। अन्य संस्थानों के साथ-साथ एक्टिविस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने यूपी के सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए नौ आयुक्तों को खुली बहस की चुनौती दी है। सामाजिक कार्यकर्ता, आरटीआई विशेषज्ञ और ‘तहरीर’ के संस्थापक अध्यक्ष संजय शर्मा ने भी वर्तमान सूचना आयुक्तों से एक साथ अकेले या खुली बहस करने की चुनौती दी है। पिछले तीन वर्षों से केंद्र सरकार सूचना का अधिकार कानून को नई ताकत देने के नाम पर इसे कमजोर करने का काम कर रही थी। साल 2011 में केंद्रीय सूचना आयोग ने तत्कालीन राष्ट्रपति (प्रतिभा पाटिल) को अपनी संपत्ति का ब्योरा देने का आदेश दिया था। उन्हीं दिनों 2-जी स्पेक्ट्रम के संबंध में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी (अब राष्ट्रपति) की फाइल टिप्पणी को सरेआम करना पड़ा था। फिर रॉबर्ट वाड्रा की लैंड डील का मामला आरटीआई के माध्यम से उछला।

इन सबका असर सरकार पर दिखाई पड़ा। 15 अक्तूबर, 2011 को केंद्रीय सूचना आयोग के सालाना सम्मलेन में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि अब हमें सूचना के अधिकार कानून पर आलोचनात्मक रुख अपनाना होगा.., आरटीआई का सरकारी विचार-विमर्श की प्रक्रिया पर उल्टा असर नहीं पड़ना चाहिए। फिर अगले साल 12 अक्तूबर, 2012 को मनमोहन सिंह ने कहा कि निजता का उल्लंघन करने वाली बेहूदा और परेशान करने वाली आरटीआई आवेदनों को लेकर चिंता पैदा हो रही है। ठीक इसके बाद ही खबर आई थी कि केंद्र सरकार ने यह फैसला किया है कि वह एक समिति गठित कर यह पता लगाएगी कि सूचना एकत्र करने और देने पर सरकार का कितना खर्च आता है।

इस तरह की बात सूचना के अधिकार अधिनियम की आत्मा के खिलाफ है, क्योंकि इस कानून की धारा 7(3) साफ तौर पर कहती कि सूचना की कॉपी पर खर्च आवेदक को ही वहन करना होगा। साफ है कि दस साल के भीतर ही इसे कमजोर करने की कवायद शुरू हो चुकी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के कई फैसलों ने आवेदकों के बीच खलबली मचा दी थी। दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया था कि हर सूचना आयोग दो-आयुक्तों का पीठ होगा, जिसमें एक हाई कोर्ट के जज होंगे। मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर कोई जज ही होगा। इस आदेश के बाद कई राज्य आयोग का कामकाज बंद हो गया। बाद में खुद सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को ‘मिस्टेक ऑफ लॉ’ कहकर वापस ले लिया। बिहार सहित कई राज्यों में धारा 20 के तहत लगाए गए दंड की सही तरीके से वसूली नहीं होती, जिसके कारण लोक सूचना पदाधिकारियों का मनोबल बढ़ता जा रहा है और आवेदक भटक रहे हैं। आज दुनिया के लगभग 100 देशों में सूचना का अधिकार कानून लागू है। दक्षिण एशिया में भारत का कानून सबसे कारगर था, क्योंकि खुद कार्यकर्ताओं ने इसकी रचना की थी और केंद्र सरकार ने भी इसे लागू करने में खासी दिलचस्पी दिखाई थी। मगर अब जब सूचना का अधिकार कानून खुद सरकारों के गले की हड्डी बन चुका है, तब कौन बचाए इसे?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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दस साल में निकला दम - Guest column - LiveHindustan.com
जाने-माने ब्रिटिश कवि और स्कॉलर रिचर्ड गारनेट ने एक बार कहा था कि हर परदे की ख्वाहिश होती है कि कोई उसे बेपरदा करे, सिवाय पाखंड के परदे का।
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Posted by: urvashi sharma <rtimahilamanchup-/E1597aS9LQxFYw1CcD5bw@public.gmane.org>



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आरटीआई विशेषज्ञ संजय की चुनौती पर सामने नहीं आया यूपी का कोई सूचना आयुक्त! अब अयोग्य सूचना आयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कराने को उच्च न्यायालय में याचिका दायर करेंगे संजय l None of 9 info commissioners dared to accept RTI Expert Er. Sanjay Sharma =?u

प्रेस विज्ञप्ति ( प्रकाशनार्थ )Press Release ( for Publication/Circulation)
 

 
आज आरटीआई  एक्ट की नौवीं सालगिरह पर राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान धरना स्थल पर पूर्वान्ह 11 बजे से अपरान्ह 03 बजे तक संस्था 'येश्वर्याज सेवा संस्थान' द्वारा  जनसुनवाई और जनजागरूकता  कैंप का आयोजन किया गया तो वही   लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था 'तहरीर'  द्वारा   उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के निराशाजनक प्रदर्शन के विरोध में  धरना और  यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने  एक्ट पर खुली बहस की आरटीआई विशेषज्ञ ई० संजय शर्मा  द्वारा दी गयी चुनौती  के कार्यक्रम का आयोजन  एक्शन ग्रुप फॉर राइट टु इनफार्मेशन , आरटीआई कॉउंसिल ऑफ़ यूपी , ट्रैप संस्था अलीगढ , सूचना का अधिकार कार्यकर्ता एसोसिएशन, पीपल्स फोरम,  मानव विकास सेवा समिति मुरादाबाद  , जन सूचना अधिकार जागरूकता मंच,भ्रष्टाचार हटाओ देश बचाओ मंच , एसआरपीडी मेमोरियल समाज सेवा संस्थान , आल इण्डिया शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स एम्पलाइज वेलफेयर एसोसिएशन, भागीदारी मंच, सार्वजनिक जबाबदेही भारत निर्माण मंच   आदि संगठनों के साथ संयुक्त  रूप से किया गया l कार्यक्रम की अध्यक्षता तहरीर संस्था के संस्थापक और अध्यक्ष o संजय शर्मा ने की l संजय शर्मा की गिनती देश के मूर्धन्य आरटीआई विशेषज्ञों में होती है  और उत्तर प्रदेश में आरटीआई के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता का लोहा प्रदेश के सभी आरटीआई कार्यकर्ता मानते हैं lकार्यक्रम में प्रतिभागी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ साथ उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रतिभाग किया l कैंप में आरटीआई विशेषज्ञों ने लोगों को आरटीआई के जनोपयोगी प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया तो वही जनसुनवाई में जनसूचना अधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और सूचना  आयोग की  आरटीआई एक्ट के क्रियान्वयन के प्रति उदासीनता से व्यथित लोगों ने अपनी समस्याएं आरटीआई विशेषज्ञों  के साथ साझा  कर समस्याओ  के समाधान  के सम्बन्ध में मार्गदर्शन प्राप्त किया l   संयुक्त कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने अपनी मांगों के सम्बन्ध  में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल  को सम्बोधित एक मांगपत्र  हस्ताक्षरित कर  प्रेषित किया  l कार्यक्रम में कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव नई  दिल्ली की ओर से येश्वर्याज को निःशुल्क उपलब्ध कराई गयी आरटीआई गाइड का भी निःशुल्क वितरण किया गया  l
 
 
 
इस सम्बन्ध में बात करते हुए संजय शर्मा ने बताया कि लोक जीवन में पारदर्शिता संवर्धन, जबाबदेही निर्धारण और आमजन के मानवाधिकारों के संरक्षण के हितार्थ उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर कार्यशील संस्था 'तहरीर'  को  प्राप्त प्रमाणों  के आधार पर उन्हें  यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि सूचना आयुक्तों की  अक्षमता के   कारण ही आरटीआई के तहत सूचना दिलाने बाली संस्था सूचना आयोग ही आज सूचना दिलाने के  मार्ग की सबसे बड़ी वाधा बन गयी है l   संजय ने कहा कि इन सूचना आयुक्तों की पोल-पट्टी खोलकर इनकी हकीकत संसार के सामने लाने के लिए ही उन्होंने   यूपी के हालिया कार्यरत 9 सूचना आयुक्तों पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनको कैमरे के सामने  एक्ट पर खुली बहस की चुनौती दी है और  कहा कि इन आयुक्तों से हार जाने की दशा में   उन्होंने इन आयुक्तों द्वारा मुक़र्रर सजाये मौत तक की हर सजा को स्वीकारने का वादा भी किया है l संजय ने बताया कि चुनौती  के सम्बन्ध में उन्होंने राज्य सूचना आयोग को  2 -मेल दिनांक 09-10-14 और 10-10-14 को प्रेषित करने के साथ साथ  उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग के सचिव के कार्यालय में  दिनांक  10-10-14 को एक तीन पेज का चुनौती पत्र व्यक्तिगत रूप से आयोग जाकर  भी प्राप्त करा दिया है l संजय ने बताया कि उनके आंकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना आयुक्तों में से कोई भी सूचना आयुक्त पद के लिए निर्धारित योग्यताओं में से 10% भी योग्यता धारित नहीं करते है l संजय बताते हैं कि  प्रदेश के सूचना आयुक्त का पद मुख्य सचिव के समकक्ष है और एक सवाल उठाते हैं कि क्या यह माना जा सकता है कि जिस कार्यालय में योग्यतानुसार नियुक्त 9 मुख्य सचिव कार्यरत हों वहां ऐसी भयंकर बदहाली व्याप्त हो जबकि मात्र 1 मुख्य सचिव पूरा सूबा संभालता है ? इस सबाल का जबाब देते हुए संजय कहते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वर्तमान में नियुक्त सभी सूचना आयुक्त नितांत अयोग्य हैं और वे मात्र  अपने राजनैतिक संबंधों के चलते ही यह महत्वपूर्ण पद पा गए हैं l बौद्धिक असम्बेदनशीलता , अक्षमता और  अपने राजनैतिक आकाओं के दबाब के चलते ही वे अपने पद की गरिमा के अनुकूल कार्य नहीं कर पा रहे हैं और इस उच्च पद को कलंकित कर रहे हैं l
 
 
 
आरटीआई विशेषज्ञ संजय शर्मा  ने बताया  कि उनकी खुली बहस की चुनौती पर आज यूपी का कोई भी  सूचना आयुक्तसामने नहीं आया l संजय ने अब अयोग्य सूचना आयुक्तों  की नियुक्तियां रद्द कराने को  उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने का निर्णय लिया है l
 
 
 
आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सूचना आयोग स्वयं ही आरटीआई एक्ट का विनाश करने में लगा है l  उर्वशी  ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नौ सूचना आयुक्त नियुक्त होने के बाबजूद आयोग में 55000 से अधिक वाद लंबित हैं जो पूरे देश के सभी सूचना आयोगों में सर्वाधिक हैं l नौ सालों में आयोग की नियमावली तक नहीं लागू हो पाई है  और  आयोग का हर कार्मिक मनमाने रूप से स्व घोषित नियमों के अनुसार कार्य कर  रहा है जिसके कारण  उत्तर प्रदेश में लागू होने के 9 वर्षों में ही सूचना का अधिकार लगभग मृतप्राय हो चुका  है l
 
 
 
यूपी के राज्य सूचना आयोग के खिलाफ लामबंद  हुए  संगठनों ने एक सुर से सूचना आयुक्तों द्वारा आयुक्त पद ग्रहण करने के बाद से अब तक की अवधि में चल-अचल सम्पत्तियों में किये गए निवेशों को सार्वजनिक कराने, यूपी के अक्षम सूचना आयुक्तों को तत्काल निलंबित कर के उनके अब तक के कार्यों  की विधिक समीक्षा कराकर इनके विरुद्ध कार्यवाही कराने , सूचना आयुक्तों के रिक्त पदों पर पद की योग्यतानुसार पारदर्शी प्रक्रिया से  सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कराने , 55000 से अधिक  लम्वित वादों की विशेष सुनवाईयां शनिवार और रविवार के अवकाश के दिनों में कराने, आयोग की नियमावली तत्काल  लागू कराने,आयोग में  नयी अपीलों और शिकायतों के प्राप्त होने के 1 सप्ताह के अंदर प्रथम सुनवाई कराने, आदेशों की नक़ल आदेश होने के 1 सप्ताह के अंदर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कराने, सूचना आयोग में रिश्वत मांगे जाने की शिकायतें करने के लिए एक सतर्कता अधिकारी नियुक्त कराने , अपीलों और शिकायतों की सुनवाई की अगली तारीखें अधिकतम  30 दिन बाद की देने,सूचना आयुक्तों और नागरिकों/ आरटीआई कार्यकर्ताओं के  पारस्परिक संवाद की प्रणाली विकसित करके प्रतिमाह एक बैठक कराने, आरटीआई कार्यकर्ताओं को  जनहित के लिए सूचना मांगने को प्रेरित करने का तंत्र विकसित कराने , सूचना आयोग में वादियों के मानवाधिकारों को संरक्षित रखने हेतु उनको खड़ा कर के सुनवाई करने के स्थान  पर कुर्सी पर बैठाकर  सुनवाई कराने , वादियों  को झूठे मामलों में फसाए जाने की स्थिति में अपना समुचित वचाव करने के लिए  वादी द्वारा मांगे जाने पर आयोग  की सीसीटीवी फुटेज तत्काल उपलब्ध कराने,  आयुक्तों द्वारा पारित आदेश लोकप्राधिकारियों की सुविधानुसार बदलने की प्रवृत्ति रोकने के लिए आयुक्त के स्टेनो की शॉर्टहैंड बुक पर पेंसिल के स्थान पर पेन  से लिखना अनिवार्य करने तथा शॉर्टहैंड बुक पर उपस्थित वादी और प्रतिवादी के हस्ताक्षर कराने  , आयुक्तों द्वारा दण्डादेशों को बापस लेने के असंवैधानिक कारनामों पर तत्काल रोक लगाने, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून के तहत तत्काल समिति बनाकर इस समिति  द्वारा अब तक  सूचना आयुक्तों के विरुद्ध महिलाओं द्वारा की  गयी उत्पीड़न की शिकायतों की तत्काल जांच कराने, आयोग के कार्यालयीन कार्यों की लिखित प्रक्रिया बनाये जाने, आयोग के द्वारा सम्पादित कार्यों की मासिक रिपोर्ट तैयार  कराकर स्वतः ही सार्वजनिक कराने आदि मांगों के साथ धरना देते हुए राज्यपाल को एक ज्ञापन भी प्रेषित किया l
 
 
कार्यक्रम का समापन करते हुए येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी शर्मा ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 3 माह में उनकी मांगें माने जाने पर प्रदेश के अन्य सभी संगठनों को  साथ लेकर सूचना आयोग और प्रदेश सरकार के खिलाफ वृहद स्तर  पर उग्र आंदोलन करने को तैयार रहने का आव्हान किया l
 
 



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RTI activists up in arms against Uttar Pradesh info officers

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RTI activists up in arms against Uttar Pradesh info officers

Oct 12, 2014 |    Age Correspondent l    Lucknow

http://wwv.asianage.com/india/rti-activists-arms-against-uttar-pradesh-info-officers-087

The RTI activists in Uttar Pradesh are up in arms against the state information commissioners (SIC) and are accusing them of holding back information to protect the government’s interests. The RTI activists, under the banner of half a dozen organisations, will be holding a demonstration on Sunday to protest against the attitude of the SICs and have even challenged them to an open debate.

According to Sanjay Sharma, who heads the ‘Tehreer ‘ organisation and is a well known RTI activist, said that the state information commission was not acting as a custodian of people’s rights. “Instead, the nine SICs who have apparently been appointed for their political loyalties are busy withholding information and protecting the government.”

He said that over 55,000 cases were pending with the state information commission which was indicative of the prevailing state of affairs. “There is no guideline for clearing a case within the time frame or even hearing it. This causes great inconvenience and the spirit of the RTI gets demolished,” he said.

RTI activists up in arms against Uttar Pradesh info officers

Oct 12, 2014 |
 
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