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कायम रहेगी बाघ की बादशाहत,शेर को राष्ट्रीय पशु बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं - पर्यावरण मंत्रालय [1 Attachment]

 
उन बाघप्रेमियों के लिए यह खबर राहत देने बाली हो सकती है जो बीते अप्रैल में  केंद्र सरकार द्वारा बाघ की बजाय शेर को राष्ट्रीय पशु बनाने पर विचार करने की  ख़बरों से  परेशान थे।
 
यूपी की राजधानी लखनऊ निवासी 'आरटीआई गर्ल'   13 वर्षीय ऐश्वर्या पाराशर  द्वारा दायर एक आरटीआई अर्जी  पर भारत सरकार के पर्यावरण, वन  एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय  द्वारा दिए गए  जबाब से यह स्पष्ट हो गया है  कि फिलहाल राष्ट्रीय पशु की  पदवी पर बाघ की ही बादशाहत कायम रहेगी
 


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विकास की योजनाओं का पैसा लोक-लुभावन योजनाओं में लगा रहे अखिलेश : इंजीनियर संजय शर्मा

विधुत उत्पादन पूंजी निवेश में माया से 18% फिसड्डी अखिलेश !........... उत्तर प्रदेश में बिजली उत्पादन  लागत 17 रुपये 76 पैसे प्रति यूनिट भी और  1 रुपये 97 पैसे प्रति यूनिट भी !
 
 
मायावती की सरकार की कार्यप्रणाली से नाखुश  उत्तर प्रदेश की जनता ने साल 2012 के आम चुनाव में शिक्षा से इंजीनियर अखिलेश यादव के युवा नेतृत्व में चुनाव लड़ने बाली समाजवादी पार्टी  को ऐतिहासिक बहुमत प्रदान कर बहुत बड़ी बड़ी अपेक्षाएं पाली थीं।  क्या मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतर रहे हैं या सूबे की जनता एक बार फिर अपने आप को ठगा गया महसूस कर रही है ?
 
Read details at undergiven weblink http://tahririndia.blogspot.in/2015/07/blog-post_4.html
 
 
यह एक ऐसा सबाल है जिसका उत्तर देना आसान नहीं है और यदि उत्तर दे भी दिया जाये तो भी अपनी गलती मानने की मानसिकता से ग्रसित ये राजनैतिक दल बिना प्रमाणों के दिए गए उत्तरों को तो मानने से रहे।  सो यहाँ सरकार से ही प्राप्त प्रमाणों के आधार पर यूपी की वर्तमान सरकार की सुस्त रफ्तार , कथनी और करनी के अंतर और अंधेर नगरी चौपट राजा बाली कार्यप्रणाली पर कुछ खुलासे कर रहा हूँ।
 
 
उत्तर प्रदेश में विकास की बातें तो बहुत होतीं है पर विकास करने के रत्ती भर भी प्रयास नहीं होते है। बिजली विकास का प्रमुख कारक है और समाज के हर तबके की मूलभूत आवश्यकता भी।  बिजली की कमी से खेती,उद्योग,ऑफिस और सामान्य जनजीवन, सभी प्रतिकूल  प्रभावित होते हैं।  यह बात हम तो समझते हैं पर शायद अखिलेश यादव के नेतृत्व बाली सपा सरकार ऐसा नहीं समझती। शायद  इसीलिये  अखिलेश ने मुख्यमंत्री के रूप में काम करते हुए अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में विधुत उत्पादन की परियोजनाओं के  पूंजीनिवेश बढ़ाने की जगह  अपनी पूर्ववर्ती मायावती के मुकाबले पूंजीनिवेश में 1071 करोड़ से अधिक की भारीभरकम कटौती कर डाली।
 
मेरा मानना  है  कि मुद्रा अवमूल्यन और बढ़ती आवादी तथा बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण बढ़ती विधुत आवश्यकता के मद्देनज़र विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में पूर्ववर्ती सरकार के मुकाबले  पूंजीनिवेश को बढ़ाने की आवश्यकता थी पर लोक-लुभावन योजनाओं को तरजीह देने बाली अपरिपक्व सरकार विकास की मूलभूत आवश्यकताओं के खर्चों में कटौती करती रही जिसका खामियाजा प्रदेश की जनता अब बढ़ती बिजली दरों और की जा रही लम्बी-लम्बी बिजली कटौती के दंश के रूप में उठा रही है।
 
मेरी एक आरटीआई के जबाब में उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के महाप्रबंधक (लेखा) एम. सी. पाल ने जो सूचना दी है   उसके अनुसार उत्तर प्रदेश की 27 विधुत उत्पादन परियोजनाओं में  वित्तीय वर्ष 2007-08 में 1690.48 करोड़  की, वित्तीय वर्ष 2008-09 में 2014.92करोड़  की, वित्तीय वर्ष 2009-10 में 2195.99 करोड़  की, वित्तीय वर्ष 2010-11 में 3037.97 करोड़  की, वित्तीय वर्ष 2011-12 में 2238.09 करोड़  की, वित्तीय वर्ष 2012-13 में 2450.99 करोड़  की, वित्तीय वर्ष 2013-14 में 975.50 करोड़  की और वित्तीय वर्ष 2014-15 में 1403.42 करोड़  की पूंजी व्यय की गयी।
 
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि मायावती के नेतृत्व बाली बहुजन समाज पार्टी की सरकार के आरंभिक 3 वर्षों में उत्तर प्रदेश की विधुत उत्पादन परियोजनाओं में  5901.39 करोड़  की पूंजी व्यय की गयी जबकि अखिलेश के नेतृत्व बाली  समाजवादी  पार्टी की सरकार के आरंभिक 3 वर्षों में उत्तर प्रदेश की विधुत उत्पादन परियोजनाओं में  4829.91 करोड़  की पूंजी व्यय की गयी है जो पूर्ववर्ती मायावती सरकार के मुकाबले  1071.48 करोड़ ( 18%) कम  है । मायावती सरकार ने अपने पांच वर्षों के कार्यकाल में विधुत उत्पादन परियोजनाओं में  11177.45 करोड़ का खर्चा किया था और अखिलेश को कागज पर मायावती की बराबरी करने के लिए भी बचे दो वर्षों में विधुत उत्पादन परियोजनाओं में  6347.54 करोड़ रुपये खर्चने होंगे।
 
 
मेरा मानना  है  कि उत्तर प्रदेश का सकल बजट साल दर साल बढ़ने के बाबजूद अखिलेश द्वारा विकास के मुख्य कारक बिजली के उत्पादन की परियोजनाओं के बजट में कटौती करने से एक बड़ा सबाल यह भी खड़ा हो रहा है कि क्या अखिलेश विकास के प्रति वास्तव में संजीदा हैं और  यह भी कि क्या अखिलेश ने यही धन अपनी लोकलुभावन योजनाओं पर व्यय किया। गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष 2007 -08  से 2014 -15  तक की 8 वर्षों की अवधि में यूपी में वित्तीय वर्षवार वित्तीय वर्ष  2007 -08 में 100911 करोड़, वित्तीय वर्ष  2008 -09 में 112472 करोड़, वित्तीय वर्ष  2009 -10 में 133596 करोड़, वित्तीय वर्ष  2010 -11 में 153199 करोड़, वित्तीय वर्ष  2011 -12 में 169000 करोड़, वित्तीय वर्ष  2012 -13 में 200110 करोड़, वित्तीय वर्ष  2013 -14 में 221201 करोड़,  और वित्तीय वर्ष  2014 -15 में 259848 करोड़  का सकल बजट पारित किया गया  था।
 
मेरा मानना  है  कि यह आरटीआई जबाब विकास के मुद्दे पर वर्तमान सरकार की सुस्त रफ्तार तथा विकास पर इस सरकार और अखिलेश यादव की  कथनी और करनी के अंतर को स्वतः ही सिद्ध कर रही है।
 
सूबे के मुखिया अखिलेश यादव इंजीनियर हैं और उत्तर प्रदेश पॉवर कॉरपोरेशन लिमिटेड के ऊर्जा विभाग के मातहत तो अनगिनत इंजीनियर और मैनेजर कार्यरत है पर मेरा मानना  है  कि  अन्धेर नगरी चौपट राजा बाली कहावत जितनी इस विभाग पर चरितार्थ होती है, शायद ही कहीं और हो।  मेरी इसी  आरटीआई के जबाब में उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के महाप्रबंधक (लेखा) एम. सी. पाल ने यह भी  सूचना दी है   कि  उत्तर प्रदेश की विधुत उत्पादन परियोजनाओं में  वित्तीय वर्ष 2013 - 14  के सम्प्रेक्षित लागत लेखों के अनुसार प्रति यूनिट बिजली की उत्पादन लागत  17 रुपये 76 पैसे प्रति यूनिट भी है और  1 रुपये 97 पैसे प्रति यूनिट भी। 
 
मुझे दी गयी सूचना के अनुसार सूबे में सबसे सस्ती बिजली का उत्पादन अनपरा '' तापीय परियोजना में 1 रुपये 97 पैसे प्रति यूनिट की दर पर हो रहा है तो वहीं सबसे मंहगी बिजली हरदुआगंज तापीय परियोजना में  17 रुपये 76 पैसे प्रति यूनिट पर बिजलीबन रही है।  अनपरा ' ' तापीय परियोजना में बिजली का उत्पादन 2  रुपये 27  पैसे प्रति यूनिट की दर पर, ओबरा ''  तापीय परियोजना में बिजली का उत्पादन 2  रुपये 66   पैसे प्रति यूनिट की दर पर, पारीछा 2x250 मे० वा०  तापीय परियोजना में बिजली का उत्पादन 4   रुपये 56   पैसे प्रति यूनिट की दर पर, पारीछा 2x210 मे० वा०  तापीय परियोजना में बिजली का उत्पादन 4   रुपये 72   पैसे प्रति यूनिट की दर पर,2x250 मे० वा०  हरदुआगंज तापीय परियोजना में बिजली का उत्पादन  5   रुपये  03  पैसे प्रति यूनिट की दर पर, ओबरा ' ' तापीय परियोजना में बिजली का उत्पादन 5  रुपये 89   पैसे प्रति यूनिट की दर पर, पारीछा 2x110 मे० वा०  तापीय परियोजना में बिजली का उत्पादन  6   रुपये  51   पैसे प्रति यूनिट की दर पर और पनकी  तापीय परियोजना में 7 रुपये 17 पैसे प्रति यूनिट पर बिजली बना रही है। 
 
इस प्रकार उत्तर प्रदेश 2 रुपये प्रति यूनिट से कम की भी बिजली बना रहा है और 17 रुपये प्रति यूनिट से अधिक की भी।  है   अन्धेर नगरी चौपट राजा बाली व्यवस्था।  मैं तो ऐसा ही मानता हूँ।
 
 
मैं सोचता हूँ कि काश अखिलेश ने बार-बार बिजली की दरें बढ़ाने के स्थान पर 2 रुपये प्रति यूनिट की दर से अधिक से अधिक बिजली बनाने के लिए प्रयास किये होते तो आम जनता को भी राहत होती और सही अर्थों में समाजवाद को पोषित होते देख लोहिया की आत्मा भी तृप्त होती।  पर मुझे लगता है कि अखिलेश को जनता, समाजवाद  और लोहिया की फिक्र ही नहीं  है।  वह तो बस राजसुख भोग रहे हैं।
 
 
इंजीनियर संजय शर्मा
संस्थापक अध्यक्ष - तहरीर
मोबाइल – 8081898081 , 9455553838


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RTI activist seeks inquiry against state information commissioner

RTI activist seeks inquiry against state information commissioner

Lucknow, July 3 -- Failing to get the required information under the RTI act, Saleem Baig, an RTI activist, has written to the governor seeking an inquiry against the state information commissioner.

Baig had sought information from Khwaja Moinuddin Chishti Urdu Arabi Farsi University on fourteen points after the university officials in a press conference declared that Urdu would not be a compulsory subject in the university.

Baig said, "The press conference was hosted in July 2014 and soon after that I filed an RTI application seeking information regarding the qualification of teachers at the university, executive council, academic council and vacant posts. But I did not receive satisfactory answers for some of the points and thus I filed...






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Fwd: Maharashtra governments attempt to amend CrPC 156 shows lack of confidence in the competence of courts of law

DEar friends

Maharashtra governments attempt to amend CrPC 156 shows lack of confidence in the competence of courts of law

Maharashtra Cabinet recently decided to amenda provision of the Criminal Procedure Code to prevent filing of an FIR against a 'public servant' without the sanction of a competent authority. However this amendment is not only against the principal of equality before law and illegal but also shows lack of confidence in the competence of courts of law. It may be possible that some lower courts may have made some errors while delivering decision as per section 156 (3) of CrPC. But there is appellate mechanism to deal with it -  http://goo.gl/j3VJh3

Regards,
Vijay Kumbhar
(Surajya Sangharsh Samiti)
09923299199



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यूपी तापीय विद्युत उत्पादन परियोजनाओं पर 8 वर्षों में राज्य के सकल बजट का मात्र 0. 29 % पूंजी निवेश !

 
संजय बिजली राखिये; बिन बिजली सब बेकार।
 बिजली बिना चल पावे  ; हो खेती ,इंडस्ट्री, ऑफिस, सरकार   या घरवार।।
 
 
क्या आपको  कवि रहीमदास की पंक्तियों को बदलकर रची  गयी यह रचना, जो मेरे दिल की  आवाज  है, सही  नहीं लग रही है ?  क्या आपको नहीं लगता है कि  बिन बिजली खेती ,इंडस्ट्री, ऑफिस, सरकार   या घरवार सब बेकार हो  जाते  हैं ? आवादी के हिसाब से देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में बिजली को लेकर लगभग सालभर हमेशा ही हाहाकारी स्थिति रहती है। हर साल गर्मियां आते ही हालात और  भी बदतर हो जाते हैं।  उद्योगपतियों से लेकर किसानों तक सभी परेशान रहते हैं और बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था करने में ही लगे  रहते हैं l पर अगर मैं आपसे कहूँ कि बिजली को लेकर उत्पन्न इस समस्या के मूल में हमारी सूबे की सरकार ही है तो क्या आप यकीन करेंगे ? शायद  नहीं।  पर मेरी एक आरटीआई अर्जी पर उत्तर प्रदेश विद्युत  उत्पादन निगम लिमिटेड द्वारा मुहैया करायी गयी सूचना तो इस तरफ ही इशारा कर रही है।
 
Access details and scanned copy of RTI reply at http://tahririndia.blogspot.in/2015/07/8-0-29.html
 
दरअसल मैंने एक आरटीआई दायर कर वित्तीय वर्ष 2007 -08  से 2014 -15  तक की अवधि में यूपी में लगाये गए नए थर्मल पावर प्लान्ट और इन पर प्रदेश सरकार द्वारा किये गए पूंजीनिवेश की धनराशि के बारे में जानना चाहा था।  बीते 19 जून को  उत्तर प्रदेश विद्युत  उत्पादन निगम लिमिटेड की पीपीएमएम इकाई के मुख्य अभियंता द्वारा मेरी इस आरटीआई अर्जी पर जो सूचना मुहैया करायी गयी  है वह वेहद चौंकानेबाली है और विद्युत  उत्पादन को  लेकर प्रदेश सरकार के उदासीन रवैये को उजागर कर रही है।  
 
 
मुझे दी गयी  अनुसार वित्तीय वर्ष 2007 -08  से 2014 -15  तक की अवधि में यूपी में 2x250 मेगावाट की हरदुआगंज तापीय विस्तार पर 3168 करोड़, 2x250 मेगावाट की पारीछा  तापीय विस्तार पर 2822.82 करोड़ और 2x250 मेगावाट की अनपरा-डी   तापीय परियोजना  पर 7027.40 करोड़ रुपयों का निवेश किया गया। इन परियोजनाओं हेतु  लागत का 70 % वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेकर और 30 % शासकीय अंशपूंजी से पूर्ण किया गया।  इनमें 13018 करोड़ के पूंजीनिवेश से तीन  नयी  थर्मल पावर प्लान्ट परियोजनाओं पर काम हुआ और 30 प्रतिशत की दर से इन पर प्रदेश सरकार द्वारा मात्र 3906 करोड़ का  पूंजीनिवेश किया गया।
 
 
 गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष 2007 -08  से 2014 -15  तक की 8 वर्षों की अवधि में यूपी में वित्तीय वर्षवार वित्तीय वर्ष  2007 -08 में 100911 करोड़, वित्तीय वर्ष  2008 -09 में 112472 करोड़, वित्तीय वर्ष  2009 -10 में 133596 करोड़, वित्तीय वर्ष  2010 -11 में 153199 करोड़, वित्तीय वर्ष  2011 -12 में 169000 करोड़, वित्तीय वर्ष  2012 -13 में 200110 करोड़, वित्तीय वर्ष  2013 -14 में 221201 करोड़,  और वित्तीय वर्ष  2014 -15 में 259848 करोड़  का सकल बजट पारित किया गया  था।  इन 8 वर्षों के  बजटों की कुल धनराशि 1350337 करोड़ रुपयों की है  जिसके सापेक्ष इन 8 वर्षों में राज्य सरकार द्वारा विधुत उत्पादन की तापीय परियोजनाओं पर  मात्र  3906 करोड़ की  धनराशि व्यय की गयी है जो मात्र 0.29% है।
 
 
मेरे अनुसार इन 8 वर्षों के मुख्यमंत्रियों मुलायम सिंह यादव, मायावती  और अखिलेश यादव की सरकारों द्वारा बजटों की कुल धनराशि के सापेक्ष राज्य सरकार द्वारा विधुत उत्पादन की तापीय परियोजनाओं पर  मात्र   0.29%  की धनराशि का यह  निवेश नगण्य ही है। 
 
 
ऐसे में जबकि हम सभी भलीभांति जानते है कि  बिजली ही  विकास का पर्याय है और पर्याप्त विद्युत ऊर्जा के बिना विकास की कल्पना  करना महज सब्जबाग़ से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है तो एक  बड़ा सबाल यह भी उठता है कि आखिर किस आधार पर  हमारे मुख्यमंत्री पिछले 8 सालों से हमें विकास का झूंठा सपना दिखाते चले आ रहे हैं ?
 
 
इंजीनियर संजय शर्मा ( संस्थापक अध्यक्ष -  'तहरीर' )
Mobile 8081898081, 9455553838
 


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ALERT : Government is reportedly thinking of revisiting the RTI Act : FE

The Financial Express



Safeguarding RTI

India was the 48th country in the world to enforce the right to information or freedom of information as a statute, through The Right to Information Act, 2005.

By: | June 30, 2015 11:44 pm


India was the 48th country in the world to enforce the right to information or freedom of information as a statute, through The Right to Information Act, 2005. Came into effect from June 15, 2005, this RTI Act empowers citizens to access information available with the ‘public authority’, as defined in the Act.

The Act brings transparency and accountability in the functioning of public authorities. Its enactment was a significant step in enhancing the standards of corporate governance in CPSEs. The RTI Act defines and re-defines the scope of governance, role and responsibility of the public authority.

Ten years have passed since the enactment of the Act, but full awareness regarding the disclosure of a particular information or its denial is still lacking with public authorities. Considerable administrative time is wasted in this confusion.

Scope, as the apex body of public sector enterprises, had taken many initiatives on RTI, including constituting a steering committee on RTI to discuss concerns of CPSEs and guide them in implementing the Act. Scope also conducted national workshops and interactive sessions on the Act. A dominant view is that RTI is often abused by vested interests and habitual information seekers, which affect the overall productivity of the enterprises.

As the government is reportedly thinking of revisiting the Act, some concerns of CPSEs may be considered.

Since considerable efforts go into the provision of information, it is only fair that the CPSEs also should have the right to know the identity of the persons seeking the information, the motive and the personal interest, if any, which may sometimes be prejudicial to the interests of the company.


Also, a PSU must also have the same privileges in seeking information from a private sector enterprise so that it creates a level-playing field. Such a level-playing field between government and non-government sectors rests on the principle of equity,especially when the listed private player or NGO is holding public money through shareholders and financial institutions.

Sometimes, all the efforts and administrative time put in by the CPSE becomes futile when the information is returned because of wrong address given by the applicant. The number of frivolous and vexatious applications are increasing by the day. Hence, frivolous and vexatious applications need to be tackled properly under the Act.

Habitual information seekers who file applications to meet their vested interest must be dealt with separately and there should be penalties for seeking irrelevant queries, particularly with ill-motives.
Similarly, clarity is required on the information sharable. Also, any guidelines issued by the government should be clear and complete.

A department of personnel and training (DOPT) circular dated 15.4.2013 envisages disclosure of information related to public-private partnership (PPP) by the public authority. But this is not under the ambit of the RTI Act.

As per this circular, all the private and public authorities need to be audited by third parties every year and the report uploaded on their respective websites. But the guidelines for the audit are yet to be framed and published by the DoPT.

Finally, there is a need for capacity building by enhancing the number of trained manpower both in the institution of Chief Information Commission (CIC) and CPSEs to tackle the large number of queries.


The author is director general, Standing Conference of Public Enterprises





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Posted by: Lokesh Batra <batra_lokesh-/E1597aS9LQAvxtiuMwx3w@public.gmane.org>



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सपा सरकार की तीन साल की उपलब्धियों का बखान करने बाले 30 लाख पत्रक छपवा अखिलेश ने फूंके जनता के 45 लाख रुपये !


सपा सरकार की तीन साल की उपलब्धियों का बखान करने बाले 30 लाख पत्रक छपवा अखिलेश ने फूंके जनता के 45 लाख रुपये !
 
Find full story, leaflet & RTI reply at http://tahririndia.blogspot.in/2015/06/30-45.html



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Posted by: urvashi sharma <rtimahilamanchup-/E1597aS9LQxFYw1CcD5bw@public.gmane.org>



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Akhilesh Yadav spent Rs. 45 Lakhs public money on 30 lakh leaflets to make SP reach every 29th literate eligible voter, Every 8th SP Voter just to popularize 3 years of SP rule in UP!

Akhilesh Yadav spent Rs. 45 Lakhs public money  on 30 lakh leaflets to make SP reach every 29th literate eligible voter, Every 8th SP Voter just to popularize 3 years of SP rule in UP!
 
 



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Posted by: urvashi sharma <rtimahilamanchup-/E1597aS9LQxFYw1CcD5bw@public.gmane.org>



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PTI : CIC files on its publicity expenses not traceable





CIC files on its publicity expenses not traceable

Press Trust of India  |  New Delhi  June 22, 2015 

Some crucial files related to funds spent on media publicity for the Central Information Commission's annual conventions during last two years are not "readily traceable", an RTI response shows.

The CIC, which is also a watchdog for record keeping in the government offices, in a recent response to activist Lokesh Batra said that the files related to expenditure on publicity are not "readily traceable".

The central government had allowed the transparency panel to spend Rs 12 lakh for organising its annual conventions besides Rs 64.81 lakh and Rs 7.50 lakh, for media campaign through DAVP and advertisement in Air India's in-flight magazine respectively.

When Batra sought details of on media expenditure sanctioned by DoPT, CPIO of CIC, S K Rabbani said, "...In this regard, it is informed that the concerned file pertaining to organising convention/ events is not readily traceable. Requisite reply will be sent as the concerned file is traced."

The Commission, however, gave figures of expenditure incurred on its annual convention saying Rs 12.06 lakh had been spent for the above Annual Conventions/Events during 2012-13.

"Rs 14.16 lakh had also been incurred during 2013-14," he said in a separate response to Batra.

Batra said it wass not the first time that CIC has responded to his RTI saying file(s) are not traceable.

"It clearly indicates poor management of records keeping in the Commission. Irony is that what commission preaches does not apply in its home.

"The analyses of expenditure reveal that instead of maintaining austerity keeping with the spirit of the RTI Act, CIC had been doing wasteful expenditure of taxpayer's money on five star hospitality and expenditure on items those can be easily dispensed with," Batra alleged.

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Posted by: Lokesh Batra <batra_lokesh-/E1597aS9LQAvxtiuMwx3w@public.gmane.org>



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Fwd: 18th anniversary of ” Cheat India Movement”




Nobody celebrated or observed openly but it was 18th anniversary of cheat India movement started by bureaucracy in hand in gloves with politicians on 24 may 1997  - http://goo.gl/sXPgQ1
Regards,
Vijay Kumbhar
(Surajya Sangharsh Samiti)
09923299199



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Posted by: vijay kumbhar <kvijay14-Re5JQEeQqe8AvxtiuMwx3w@public.gmane.org>



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Fwd: 18th anniversary of ” Cheat India Movement”


Nobody celebrated or observed openly but it was 18th anniversary of cheat India movement started by bureaucracy in hand in gloves with politicians on 24 may 1997  - http://goo.gl/sXPgQ1
Regards,
Vijay Kumbhar
(Surajya Sangharsh Samiti)
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