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येश्वर्याज का आरटीआई कैंप और यूपी के सबसे निकृष्ट सूचना आयुक्त का पता लगाने के लिए सर्वे : जैसा कि लखनऊ के समाचार पत्रों में छपा [29 Attachments]

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येश्वर्याज का आरटीआई कैंप और यूपी के सबसे निकृष्ट सूचना आयुक्त का पता लगाने के लिए सर्वे : जैसा कि लखनऊ के समाचार पत्रों में छपा


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RTI Camp & Survey to choose the worst info-commissioner as published in Lucknow local Newspapers.

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Justice THAKUR on Trial



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देश के आरटीआई कार्यकर्ताओं पर 315 से अधिक हमलों और 50 से अधिक हत्याओं के लिए पीआइओ-सूचना आयुक्त का भ्रष्ट गठजोड़ जिम्मेदार : उर्वशी शर्मा


 
लखनऊ/23 अप्रैल 2016/ यह भी क्या संयोग है कि साल 1976 में राज नारायण बनाम उत्तर प्रदेश के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 19 में वर्णित सूचना पाने के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया गया था पर जनांदोलनों के कड़े संघर्ष के परिणामस्वरूप भारत की जनता को प्राप्त सूचना का अधिकार अधिनियम लागू होने के लगभग 11 वर्ष बाद और राज नारायण बनाम उत्तर प्रदेश मामले के इस निर्णय के 40 साल बाद भी उसी उत्तर प्रदेश में लोगों को इस सूचना के अधिकार को लेने के लिए जद्दोजहत करनी पड़ रही है l इस जद्दोजहत की बानगी आज राजधानी लखनऊ में सामाजिक संस्था येश्वर्याज सेवा संस्थान द्वारा आयोजित आरटीआई कैंप में दिखाई दी जहां प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों से आये सैकड़ों आरटीआई प्रयोगकर्ताओं ने  अपने जानने के मूलभूत हक के रास्ते में आने बाली समस्याओं के समाधान के लिए और येश्वर्याज के सर्वे में भाग लेने के लिए अप्रैल की रिकॉर्डतोड़ गर्मी की परवाह किये बिना अपनी उपस्थिति दर्ज कराई l
 
कार्यक्रम की आयोजिका सामाजिक कार्यकत्री उर्वशी शर्मा ने बताया कि आरटीआई एक्ट जन-साधारण का एक्ट है जिसे देश के प्रत्येक नागरिक द्वारा सरलता से प्रयोग के लिए बनाया गया है किन्तु भ्रष्ट तंत्र ने धीरे-धीरे इस एक्ट को भी कानूनी लफ्जों के मकडजाल में उलझा दिया है l बकौल उर्वशी अब हालात इतने खराब हो गए हैं कि जन सूचना अधिकारियों से लेकर सूचना आयुक्त तक सभी इस कोशिश में लगे हैं कि कौन सा गैरकानूनी तरीका अपनाकर सूचना को सार्वजनिक किये जाने से रोका जाए l उर्वशी के अनुसार आज हालात ऐसे हो गए हैं कि लोक प्राधिकरणों के भ्रष्टाचार एवं अनियमितताएं छुपाने के लिए जनसूचना अधिकारी सही सूचना देने की जगह कुछ भी लिखकर भेज देता है और भ्रष्टाचार का चश्मा पहने प्रथम अपीलीय अधिकारी तो अपने निर्णयों में विवेक का इस्तेमाल कर आरटीआई एक्ट के प्राविधानों के अनुसार निर्णय नहीं ही कर रहे हैं पर सूचना आयुक्त तो इससे भी आगे जाकर अपने सूचना दिलाने के दायित्वों का निर्वहन करने के स्थान पर आरटीआई आवेदक को ‘तारीख पर तारीख’ के मकडजाल में उलझाकर लोकसेवकों और प्रभावित पक्ष द्वारा और स्वयं भी आरटीआई आवेदक का उत्पीडन कर रहे हैं और इनमें से अनेकों मामलों में आरटीआई प्रयोगकर्ताओं को हतोत्साहित करने के लिए 315 से अधिक पर  हमले भी कराये गए हैं और 50 से अधिक की हत्या भी हुई है l
 
उर्वशी ने बताया कि देश में अब तक 315 से अधिक आरटीआई आवेदकों पर प्राणघातक हमले या गंभीर उत्पीडन की घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें 63 हमलों के साथ महाराष्ट्र प्रथम स्थान पर है,40 ऐसे मामलों के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है, 39 मामलों के साथ गुजरात तीसरे स्थान पर है तो वहीं 23 हमलों के साथ दिल्ली का चौथा स्थान है l हमलों के 22 मामलों के साथ कर्नाटक पांचवें स्थान पर है,15 मामलों के साथ आंध्र प्रदेश छठे स्थान पर है, 14-14 मामलों के साथ बिहार और हरियाणा  सातवें स्थान पर है, 12 मामलों के साथ उडीसा आठवें स्थान पर है,9 मामलों के साथ पंजाब नौवें स्थान पर है और 8 मामलों के साथ तमिलनाडु दसवें स्थान पर l बकौल उर्वशी आरटीआई आवेदकों पर हुए प्राणघातक हमलों के ये मामले देशव्यापी हैं अर्थात भारत के उत्तर में जम्मू-कश्मीर से दक्षिण के तमिलनाडु तक l और पूर्व के आसाम,मणिपुर,मेघालय,नागालैंड,त्रिपुरा से पश्चिम के गुजरात तक सभी राज्यों में ये हमले हो चुके हैं l
 
उर्वशी ने बताया कि हाल के 11 वर्षों में देश में 50 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है । महाराष्ट्र में 12  आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है, इसके बाद 8-8 हत्याओं के साथ उत्तर प्रदेश और गुजरात दूसरे स्थान पर हैं। 5  हत्याओं के साथ बिहार तीसरे स्थान पर और 4 हत्याओं के साथ कर्नाटक चौथे स्थान पर है  
 
आरटीआई कार्यकत्री उर्वशी ने बताया कि उत्तर प्रदेश में तो हालात इतने खराब हो गए हैं कि आधे से अधिक हमलों और उत्पीडन के ये मामले सूचना आयोग परिसर में सरकार के भाड़े के गुंडों की तरह व्यवहार कर रहे सूचना आयुक्तों द्वारा स्वयं किये किये गए हैं l उर्वशी ने बताया कि कुछ सूचना आयुक्तों द्वारा महिला आरटीआई आवेदकों के साथ दुर्व्यवहार के बाद भी मुख्य सूचना आयुक्त जावेद उस्मानी महाभारत के धृतराष्ट्र जैसा व्यवहार कर हैं और उनके अनेकों आग्रहों के बाद भी सूचना आयोग में आज तक यौन उत्पीडन की जांच के लिए विशाखा समिति का गठन तक नहीं हो पाया है l  उर्वशी ने बताया कि सामाजिक संगठन येश्वर्याज अब भारत सरकार और सभी राज्य सरकारों को पत्र भेजकर सूचना आयुक्तों द्वारा आरटीआई आवेदकों के उत्पीडन की शिकायतें ग्रहण कर उनके समयबद्ध निस्तारण के लिए एक अलग नियमावली बनाने की मांग करेगा  l
 
कैंप में आये आरटीआई विशेषज्ञ समाजसेवी आर. एस. यादव और उच्च न्यायालय लखनऊ बेंच के अधिवक्ता रुवैद कमाल किदवई ने प्रतिभागियों को बताया कि आरटीआई एक्ट की धारा 8 और 9 के प्राविधानों के अलावा यदि उनका आरटीआई आवेदन बापस किया जाता है तो यह गैरकानूनी है l किदवई ने आरटीआई आवेदकों को जनसूचना अधिकारियों द्वारा धारा 8 और 9 के प्राविधानों के अलावा सूचना देने से मना करने तथा दी गयी सूचनाओं के अपूर्ण या भ्रमपूर्ण या असत्य होने की स्थिति में अपनी आपत्तियों में आरटीआई एक्ट के कानूनी पहलुओं का समावेश करने पर प्रशिक्षित किया l
 
कार्यक्रम के समन्वयक समाजसेवी तनवीर अहमद सिद्दीकी ने बताया कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम आदमी का ही देश का असली मालिक होने की वास्तविकता का भान कराने के लिए आयोजित किये गए इस कैंप का उद्देश्य आरटीआई प्रयोगकर्ताओं को आरटीआई कानून की बारीकियों पर प्रशिक्षित कर इस अधिकार का पुरजोर तरीके से इस्तेमाल करने के लिए तैयार करने का था जिसमें यह कैंप सफल रहा है l
 
येश्वर्याज की सचिव उर्वशी शर्मा ने बताया कि आज उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग में बर्तमान कार्यरत मुख्य सूचना आयुक्त और 9 सूचना आयुक्तों में से सबसे खराब कार्य करने वाले सूचना आयुक्त का पता लगाने के लिए और आरटीआई एक्ट को प्रभावी रूप से लागू करने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा का पता लगाने के लिए  सर्वे भी कराया गया है l उर्वशी ने बताया कि सर्वे में अनेकों प्रतिभागियों द्वारा दोनों मुद्दों पर एक से अधिक विकल्पों को चुने जाने के कारण सही गिनती करने में समय लगने के चलते परिणाम की घोषणा बाद में प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से की जायेगी l
 
कार्यक्रम में नई दिल्ली की सामाजिक संस्था कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सी.एच.आर.आई) के सौजन्य से उपलब्ध 75 आरटीआई मार्गदर्शिका का निःशुल्क वितरण पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर  किया गया l 
 
अनेकों सामाजिक संगठनों के साथ साथ उनके पदाधिकारी डा० संदीप पाण्डेय,डा० नीरज कुमार, कमरुल हुदा,जितेन्द्र वहादुर सिंह होमेंद्र मिश्रा,पंकज मिश्रा,अशोक कुमार गोयल,हरपाल सिंह,संजय आज़ाद,स्वतंत्र प्रिय गुप्ता, शीबू निगम,शमीम अहमद,शिव नारायण श्रीवास्तव,एस.के.गौतम,अश्विन जायसवाल,प्रेम गर्ग,फरहत खानम,मनीष,आर.डी.कश्यप,मनोज कुमार आदि ने कार्यक्रम में प्रतिभाग किया l   
 
 


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कौन है यूपी का सबसे खराब इन्फॉर्मेशन कमिश्नर? सर्वे में मिलेगा जवाब

कौन है यूपी का सबसे खराब इन्फॉर्मेशन कमिश्नर? सर्वे में मिलेगा जवाब

newztrack.com  Apr 20, 2016  23:00:09  
प्रतीकात्मक फोटो
लखनऊ: राजधानी में 23 अप्रैल को एक अनोखा सर्वे होगा। इसमें यूपी के नौ इन्फॉर्मेशन कमिश्नर्स में से सबसे खराब काम करने वाले को चुना जाएगा। यह सर्वे आरटीआई पर काम करने वाली संस्था करा रही है।
आरटीआई कैंप में फॉर्म भरवा कर होगा सर्वे
-सर्वे को कराने वाली संस्था येश्वर्याज की मेंबर उर्वशी शर्मा ने बताया कि जनता और कैंप में आए लोगों से एक फॉर्म भरवाकर उनकी राय ली जाएगी।
-कैंप 23 अप्रैल को सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक हजरतगंज स्थित जीपीओ पार्क में लगेगा।
-इस दिन एक आरटीआई जनजागरूकता कैंप का भी लगाया जाएगा।
-इसमें एक्सपर्ट कैंप आम लोगों को आरटीआई एक्ट के प्रयोग में आ रही दिक्कतों को सुलझाएंगे।
-कार्यक्रम में नई दिल्ली की सामाजिक संस्था कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) की तरफ से आरटीआई गाइड मुफ्त में बांटी जाएगी।
आरटीआई एक्टिविस्ट को किया जा रहा परेशान
-उर्वशी शर्मा ने आरोप लगाया कि पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश के इन्फॉर्मेशन कमिशनर्स सुनवाइयों के दौरान आरटीआई एक्टिविस्ट्स को परेशान कर रहे हैं।
-कुछ ने तो पद ग्रहण के समय ली गई शपथ के उलट जाकर आरटीआई एक्ट को कमजोर करने वाला काम किया है।
-आम लोगों को इन्फॉर्मेशन कमिश्नर्स से इस तरह के व्यवहार की किसी तरह से उम्मीद नहीं है।
पहले गवर्नर से होगी अपील फिर दाखिल करेंगे पीआईएल
-उर्वशी ने बताया कि पहले इस सर्वे के आधार पर सबसे खराब इन्फॉर्मेशन कमिशनर को चुनकर उन्हें हटाने के लिए यूपी के गवर्नर राम नाईक से अपील की जाएगी।
-इस मामले में अगर जरूरी हुआ तो हाईकोर्ट में एक पीआईएल भी दायर की जाएगी।
-इस सर्वे के आधार पर आरटीआई एक्ट के इम्प्लीमेंटेशन में आ रही समस्याओं में से सबसे बड़ी समस्या का भी पता लगाकर यूपी के सीएम के जरिए से इसका हल निकालने की कोशिश की जाएगी।
ये हैं इन्फॉर्मेशन कमिश्नर
– जावेद उस्मानी, मुख्य सूचना आयुक्त
– अरविंद सिंह बिष्ट, सूचना आयुक्त
– गजेंद्र यादव, सूचना आयुक्त
– खदीजतुल कुबरा, सूचना आयुक्त
– पारस नाथ गुप्ता, सूचना आयुक्त
– हाफिज उस्मान, सूचना आयुक्त
– राजकेश्वर सिंह, सूचना आयुक्त
– विजय शंकर शर्मा, सूचना आयुक्त
– स्वदेश कुमार, सूचना आयुक्त
– हैदर अब्बास रिजवी, सूचना आयुक्त




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Public Survey: select the worst Information Commissioner


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Public Survey: select the worst Information Commissioner 

newztrack.com  Apr 20, 2016  19:14:58  

Lucknow: In a first of its kind public survey, a social organisation of the state capital will select the worst Information Commissioner.

The survey has been aimed to expose the Information Commissioner who is functioning against the interest of Right To Information (RTI) act and victimising the social activists.The name of the selected one will sent to the Governor with a request to dismiss him or her.

The open meeting will take place in the historical GPO park in lucknow on Saturday next. Various social and RTI activists will participate in the day-long meeting, the convenor Urvashi Sharma informed.

At present there are one Chief Information Commissioner Javed Usmani along with nine ICs namely Arvind Singh  Bisht, Gajendra Yadav,Kahdijaitul Kubra, Paras Nath Gupta,Hafiz Usman,Rajkeshwar Singh, Vijjay Shankar Sharma,Swadesh Kumar and Haidar Abbas Rizvi.


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RTI reveals NHPC earned Rs.194 billion from hydel projects in J&K between 2001-2015 while MoU requires working out a method for transfer of projects back to J&K [4 Attachments]

Dear all,
A problem commonly raised by participants at our training workshops on the right to information (RTI) held across Jammu and Kashmir (J&K), over several years, is the frequent and long power outages they experience, almost on a daily basis. Having sojourned through several parts of the Kashmir valley, apart from far flung areas like Kargil, during the last few years, I experienced, first hand, these long periods of power supply breakdown. LCD projectors and public address systems would stop working abruptly in the middle of a workshop due to power outage and one had to resort to other methods of teaching RTI procedures. In Kargil, a major complaint that youth participants voiced at our workshop held last year was the increased frequency and duration of power outages during the exams season.

During a visit to Srinagar, earlier this year, when the State was placed under Governor's rule and negotiations for installing a new government were still on, I came across media reports about the efforts made by the J&K Government to "buy back" some of its hydro power projects from the Government of India (GoI). Upon researching this issue, it turned out that the Group of Interlocutors for J&K appointed by the Union Government, in October 2010, to hold discussions with all sections of opinion in J&K and identify the political contours of a solution and the road map towards it, had looked into this issue. In 2012, this Group recommended the transfer of power projects under the Central Government's control back to the State as one of the several "Economic and Social Confidence Building Measures" required to reach the eventual solution (see Exec Summary on page 7). Strangely the Interlocutors' Report has disappeared from the webpage of the Union Home Ministry where it was hosted earlier. Google did not throw up any search result for its new "home". Meanwhile the full text of the report may be accessed on the website of FirstPost.com

Further research showed that in March 2015, while replying to a question raised by the MP elected from Srinagar, in the Lok Sabha, the Union Minister of State for Power (independent charge) stated as follows: 

"The Task Force on the development of Jammu & Kashmir recommended transfer of certain Power Projects of NHPC including Dulhasti Hydroelectric Project (HEP) to State Government. The recommendation was considered by the Union Government and not accepted as the power generated from the project has already been allocated to various States including J&K. Also the transfer of the project is likely to entail considerable financial, non-financial and legal problems." [emphasis supplied]

To a lay reader, the Minister's reply conveys a sense of finality on the issue of buyback of hydel projects by the J&K Government. However, my recent RTI intervention seems to indicate otherwise.


RTI intervention regarding the "buyback" of hydel projects in J&K
After experiencing a particularly bad phase of power outages in Srinagar and Kulgam during my visit in March this year, I filed a request for information under the Central Right to Information Act, 2005 (RTI Act) seeking copies of the correspondence between GoI and J&K Govt. about the 'buyback' idea and all related file notings. The Ministry of Power washed its hands off by transferring the RTI application to NHPC Ltd. (NHPC) which is actually implementing the hydel projects in J&K. NHPC replied that disclosure of the information sought by me would harm its commercial interests. The RTI reply indicated that the issue of buy back has not been resolved yet and negotiations seem to be going on even now. This appears to be a positive sign. The RTI application and the responses are in the 1st attachment.

However, the NHPC's stance that Section 8(1)(d) of the Central RTI Act is attracted to the information request, is facile, to say the very least. That exemption is available only for a "third party" and that too only for matters of commercial confidence (and not merely commercial interest) where the disclosure of information would harm its competitive position. A public authority which receives the RTI application cannot use this clause to protect its own information under Section 8(1)(d). A public authority cannot be both the 'second party' and the 'third party' to one RTI application (where the first party is the RTI applicant and the initiator of the cause of action). Further, the Central Public Information Officer (CPIO) has only parroted the reply received from another officer without applying his mind to the contents of the reply. As the designated CPIO, it is well settled now that despite any response that he may receive from another colleague regarding a pending RTI application, the decision to disclose or not is his own. The case law on this issue is well developed. That responsibility cannot be delegated to any other officer, howsoever senior in rank to the CPIO. So the CPIO's reply is bad in law and fit to be challenged in due course.


RTI intervention regarding the MOU and the power generated and sold by NHPC from J&K
My 2nd RTI intervention was directly with the NHPC. I sought a copy of the Memorandum of Understanding (MoU) signed between GoI and the J&K Govt. regarding the handing over of existing hydel projects to NHPC and the development of the hydro-electric potential in the State. The NHPC has recently supplied the information after collecting an additional fee of Rs. 24/-. The NHPC also supplied data about the quantum of electricity generated by the hydel projects situated in J&K and the revenues it earned from selling power produced in J&K during the last 15 years (2nd attachment). The main findings from the RTI replies are summarised below:

1) The MoU was signed by the then Chief Minister of J&K and the then Minister for Power in the Central Government. The MoU transfers the following 7 hydel projects: Kishanganga, Uri-II, Bursar, Sewa-II, Pakal Dul, Nimmo Bazgo and Chutak, to NHPC, in order to "exploit the large power potential in the State". The purpose of the transfer is to enable NHPC to "execute these projects over a period of 10 years", in phases so that their implementation would help the State in its overall development apart from "meeting its winter peak requirements of electricity". The installed capacity of these projects is said to be a little more than 2,000 megawatts. Details are available in the March 2015 reply of the Minister for Power given in the Lok Sabha. 40% of the hydel power generated by NHPC projects across the country flows from J&K.

2) According to the MoU, the J&K Govt. must get 12% of the power generated by these hydel projects free of cost. Another 15% of the unallocated quota of power from the Central share would be provided to J&K at bus bar rates to meet winter peak requirements.

3) These hydel projects mentioned above were handed over to NHPC for funding, execution and operation under the MoU. Most importantly, the MoU requires the working out of an acceptable methodology for handing over these projects to J&K Govt. separately. Presumably, the handing over was to be planned after the completion of 10 years of the execution of the MoU.

So, at least on the face of it, the Union Power Minister's reply in the Lok Sabha in May 2015 seems to contradict the terms of the MoU, regarding transfer of the power projects after 10 years. What is also interesting is that there is no mention of a "buyback" of these projects by GoJ&K. The language of the MoU only talks about "handing over the projects" to J&K Govt.. However, because of the denial of access to the correspondence between GoI & the J&K Govt. about this issue it is not possible to clear up this mystery until further disclosures are made.

4) Since 2001-02 up to 01 March 2016, the hydel projects across J&K executed by NHPC have generated at least 115,636 MUs (million units). The RTI reply (2nd attachment) wrongly calculates the total as 115,637 MUs. If the individual figures are correct then the total has to be 115,636 MUs. If the total is correct, then one of the annual power generation figures provided by NHPC is wrong. (The data about annual power generation and sales furnished by NHPC under the RTI Act is in the 3rd attachment in the form of a dataset. The summary data is in the first sheet followed by year-wise production and sales figures in successive sheets.) Pakal Dul project does not seem to have taken off, so power generation does not appear to have begun in that project.

5) While according to the MoU, NHPC was required to sell 15% of the power generated in the State to J&K Govt., between 2001-2015 (14 years), it actually sold 19.7% of the power generated in J&K. This figure does not include the 12% of power generated that NHPC is required to supply to J&K free of charge under the terms of the MoU. (While power generation figures are available up to 01 March, 2016, sales figures for this period have not been provided by NHPC.)

6) When Ms. Mehbooba Mufti, now Chief Minister of J&K, raised a query in the Lok Sabha, in July 2014, regarding the amount of revenue earned by the NHPC projects in 2013-14, the Minister for Power assured her that the information was being collected. It is not known whether she was provided with the information subsequently. However the RTI response from the NHPC contains sales figures for a 14-year period (sales figures for 2015-16 have not been provided by NHPC yet, perhaps they are being compiled). 

7) Between 2001-2015 (14 years), by its own calculation, NHPC earned more than Rs. 194 billion (Rs. 19,431.92 crores to be exact) from the sale of power generated in J&K to all power utilities including the J&K Govt. However, when the sales figures provided by NHPC under the RTI Act are totalled up on MSExcel spreadsheet, the sales figures go up slightly to Rs. 19,442.56 crores.

8) Between 2001-2015 (14 years), by selling 20,841.65 MU of power to J&K Govt. alone, NHPC earned a little more than Rs. 41 billion (Rs. 4,129.58 crores to be exact). This includes the power generated by the hydel power plants situated at Chutak and Nimmo Bazgo and sold to the J&K Govt. exclusively.

9) Punjab is the biggest buyer of the power generated in J&K followed by Haryana, Delhi, Uttar Pradesh, Rajasthan, Uttarakhand and Himachal Pradesh. Multiple power utilities, some of which are in the private sector in the States of Haryana, Rajasthan and Delhi bought power generated in J&K from NHPC. Punjab actually bought more power than J&K, every year during this period.

10) Replying to a question raised by a member of the Opposition in the Lok Sabha, the Union Power Minister stated in the Lok Sabha in August 2015, that NHPC was not a loss making public sector undertaking (PSU). GoI is said to have approved a proposal to disinvest 11.36% of its shares in the NHPC. In April, 2015 the Minister of State for Finance replying to a question in the Lok Sabha stated that GoI had disinvested Rs. 21.31 billion (Rs. 2,131 crores) worth of its shares in the NHPC. How much profit NHPC is making from the J&K-based hydel projects remains to be explored through RTI.

So the overall picture that emerges from the information supplied under the RTI Act is of J&K being a power surplus State that lights up homes and powers industries across northern India while its own people face severe power outages day after day. More than 2/3rds of the hydel power generated in J&K is consumed outside this State. During an informal conversation some officers of the J&K Govt. told me that the State power utility could not get its act right to improve power supply in the State. Be that as it may, the first woman Chief Minister has her task cut out to empower the people in J&K (pun intended).

This data and analysis is being disseminated with a view to facilitate informed debate about the power supply and distribution situation in J&K and devise ways for augmenting it. I request readers to make use of this material keeping in mind this intention. I thank young John Mascrinaus, a student of Amity University, for all help with the creation of the dataset and cross checking the calculations made in this study. A press statement from our partner organisation - J& RTI Movement on this issue is also enclosed.

Please circulate this email widely. Friends in the media sector may please note that this email alert is not being shared exclusively with anybody. It is being circulated sufficiently early so that mediapersons may make use of this material in their own writings with due attribution.


In order to access our previous email alerts on RTI and related issues please click on: www.humanrightsinitiative.org/blog. If you do not wish to receive these email alerts please send an email to this address indicating your refusal.


Thanks
Venkatesh Nayak
Programme Coordinator
Access to Information Programme
Commonwealth Human Rights Initiative
#55A, 3rd Floor, Siddharth Chambers-1
Kalu Sarai, New Delhi- 110 016
Tel: +91-11-43180201/ 43180215

The people of this country have a right to know every public act, everything, that is done in a public way, by their public functionaries. They are entitled to know the particulars of every public transaction in all its bearing": Justice K K Mathew, former Judge, Supreme Court of India, (1975)

"“Where a society has chosen to accept democracy as its credal faith, it is elementary that the citizens ought to know what their government is doing": Justice P N Bhagwati, former Chief Justice, Supreme Court of India, (1981)

"Information is the currency that every citizen requires to participate in the life and governance of society”: Justice A. P. Shah, former Chief Justice, Delhi and Madras High Courts, (2010)





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यूपी : सबसे खराब काम करने वाले सूचना आयुक्त का पता लगाने के लिए सर्वे 23 अप्रैल को लखनऊ में [1 Attachment]

लखनऊ / 20 अप्रैल 2016/ आगामी 23 अप्रैल को यूपी की राजधानी लखनऊ में एक अनूठा सर्वे होने जा रहा है. उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग में बर्तमान कार्यरत मुख्य सूचना आयुक्त और 9 सूचना आयुक्तों में से सबसे खराब कार्य करने वाले सूचना आयुक्त का पता लगाने के लिए एक सामाजिक संस्था द्वारा किये जा रहे इस सर्वे का कार्य दिनांक 23 अप्रैल 2016 दिन शनिवार को राजधानी के हजरतगंज जीपीओ स्थित महात्मा गांधी पार्क में 11 बजे पूर्वाह्न से 4 बजे अपराह्न तक किया जाएगा. यूपी में विगत 15 वर्षों से पारदर्शिता संवर्धन और जबाबदेही निर्धारण के क्षेत्र में कार्य कर रही सामाजिक संस्था येश्वर्याज सेवा संस्थान इसी दिन एक और सर्वे कराकर आरटीआई एक्ट को प्रभावी रूप से लागू करने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा का पता लगाने के लिए भी सर्वे करा रही है.कार्यक्रम के आयोजकों ने बताया कि इस दिन एक आरटीआई जनजागरूकता कैंप का भी आयोजन किया जा रहा है जिसमें उपस्थित आरटीआई एक्सपर्ट कैंप में आने वाले आम जन को आरटीआई एक्ट के प्रयोग में आ रही दिक्कतों के व्यवहारिक समाधान सुझायेंगे. कार्यक्रम में नई दिल्ली की सामाजिक संस्था कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सी.एच.आर.आई) के सौजन्य से आरटीआई मार्गदर्शिका का निःशुल्क वितरण भी किया जाएगा.
 
 
 
 
 कार्यक्रम की आयोजिका सामाजिक कार्यकत्री और येश्वर्याज की सचिव उर्वशी शर्मा ने बताया कि उनकी संस्था के स्वयंसेवी इस सर्वे के लिए आम जनता और कैंप में आये लोगों से एक फॉर्म भरवाकर उनकी राय लेंगे. उर्वशी ने बताया कि विगत कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्तों द्वारा सुनवाइयों के दौरान आरटीआई प्रयोगकर्ताओं के उत्पीडन की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है और वर्तमान सूचना आयुक्तों में से कुछ आयुक्तों के द्वारा अपने पद ग्रहण के समय ली गयी शपथ के प्रतिकूल जाकर पारदर्शिता विरोधी माइंडसेट के तहत आरटीआई एक्ट को कमजोर करने वाले कृत्य किये जा रहे है. उर्वशी का कहना है कि  सूचना आयुक्तों का इस प्रकार का व्यवहार किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है और ऐसे आयुक्तों को पद पर बने रहने का कोई भी विधिक और नैतिक अधिकार नहीं है. उर्वशी ने बताया कि इस सर्वे के आधार पर उत्तर प्रदेश के वर्तमान कार्यरत मुख्य सूचना आयुक्त जावेद उस्मानी और 9   सूचना आयुक्तों अरविन्द सिंह बिष्ट,गजेन्द्र यादव,खदीजतुल कुबरा,पारस नाथ गुप्ता,हाफिज उस्मान,राजकेश्वर सिंह,विजय शंकर शर्मा,स्वदेश कुमार और हैदर अब्बास रिज़वी में से सबसे निकृष्ट का चयन करके उसे पदच्युत करने के लिए पहले यूपी के राज्यपाल से गुहार लगाई जायेगी और यदि आवश्यक हुआ तो उच्च न्यायालय में पीआईएल भी दायर की जायेगी.
 
 
 
उर्वशी ने बताया कि क्योंकि यूपी के समाजसेवी उनकी अगुआई में बीते 11 अप्रैल को आरटीआई भवनके मुख्यद्वार के सामने मुख्य सूचना आयुक्त  और सभी 9 सूचना आयुक्तों का पुतला दहन कर सूचना आयुक्तों के प्रति अपना रोष जाहिर कर चुके हैं इसलिए उनके संगठन द्वारा यह खुला सर्वे पारदर्शी रीति से कराया जा रहा है और इस सर्वे कार्य की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए उनके संगठन ने यूपी के राज्यपाल, प्रशासनिक सुधार विभाग के प्रमुख सचिव, मुख्य सूचना आयुक्त जावेद उस्मानी और सूचना आयोग के सचिव को पत्र लिखकर इस सर्वे कार्य के पर्यवेक्षण के लिए अपने प्रतिनिधियों को भेजने का आग्रह भी किया है.
 
 
 
उर्वशी ने बताया कि इस सर्वे के आधार पर आरटीआई एक्ट के इम्प्लीमेंटेशन में आ रही समस्याओं में से सबसे बड़ी समस्या का भी पता लगाकर यूपी के सीएम के माध्यम से उसके समाधान के प्रयास किये जायेंगे.
 
 
 
 
कार्यक्रम की आयोजिका उर्वशी ने बताया कि कार्यक्रम में ‘येश्वर्याज सेवा संस्थान’ के साथ दो अन्य पंजीकृत संस्थाएं ‘सूचना का अधिकार बचाओ अभियान’ और ‘एस.आर.पी.डी.एम.एस. सेवा संस्थान’ भी सहभागी संस्थाओं के रूप में प्रतिभाग कर रही हैं. ‘सूचना का अधिकार बचाओ अभियान’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और समाजसेवी तनवीर अहमद सिद्दीकी कार्यक्रम का समन्वयन करेंगे, ‘एस.आर.पी.डी.एम.एस. सेवा संस्थान’ के सचिव आर. एस. यादव कैंप में आर.टी.आई. एक्सपर्ट के रूप में उपस्थित रहेंगे और उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ के अधिवक्ता रुवैद कमाल किदवई कैंप में आरटीआई मामलों पर विधिक सलाह देने के लिए उपस्थित रहेंगे.      
 
 
 


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UP में R.T.I. एक्ट के लागू होने के 11वें वर्ष में RTI जनजागरूकता कैंप एवं खुला सर्वेक्षण



UP में R.T.I. एक्ट के लागू होने के 11वें वर्ष में RTI जनजागरूकता कैंप एवं
खुला सर्वेक्षण

1) आरटीआई एक्ट को प्रभावी रूप से लागू करने के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा का पता लगाने के लिए जन सूचना अधिकारियों की कार्यप्रणाली,प्रथम अपीलीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली,राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली तथा आरटीआई नियमावली 2015 के एक्ट विरोधी नियमों में किसी 1 का चुनाव करने के लिए और
2) उत्तर प्रदेश के वर्तमान सूचना आयुक्तों में से सबसे निकृष्ट आयुक्त का चयन करने के लिए

दिनांक और समय : 23 अप्रैल 2016,दिन शनिवार,11 बजे पूर्वाह्न से 4 बजे अपराह्न तक

स्थान : UP की राजधानी लखनऊ के हजरतगंज जीपीओ के पास स्थित महात्मा गांधी पार्क में

आयोजक संस्था : येश्वर्याज सेवा संस्थान,लखनऊ

निःशुल्क आरटीआई मार्गदर्शिका वितरण : कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सी.एच.आर.आई), नई दिल्ली के सौजन्य से

सहयोगी संस्थाएं : सूचना का अधिकार बचाओ अभियान (सी.पी.आर.आई.), एस.आर.पी.डी.एम.एस. सेवा संस्थान

आयोजिका : उर्वशी शर्मा (मोबाइल 9369613513)
समन्वयक : तनवीर अहमद सिद्दीकी (मोबाइल 9335011869)
मोबाइल हेल्पलाइन 8081898081 & 9455553838
Helpmail upcpri <at> gmail.com


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जन सूचना अधिकारियों को सूचना न देने की उल्टी सीख दे रहे यूपी के सूचना आयुक्त हाफिज उस्मान !


लगता है कि हाफिज उस्मान जैसे सूचना आयुक्तों ने अपने व्यक्तिगत निहितार्थ साधने के लिए और अपने राजनैतिक आकाओं को खुश करने के लिए यूपी में पारदर्शिता कानून को समाप्त करने की सुपारी ले ली है. तभी तो सूचना देने की बात के स्थान पर यह आयुक्त जनसूचना अधिकारियों को सूचना देने से मना करने के लिए डुगडुगी लेकर शहर शहर घूम रहा है
 
अपना धंधा चमकाने में लगे ऐसे आयुक्त अब आरटीआई को कमाई का धंधा और आरटीआई एक्टिविस्टों को ब्लैकमेलर कहकर अपनी पतित मानसिकता का ही परिचय दे रहे हैं क्योंकि यदि ये आयुक्त सही हैं तो ब्लैकमेलर के साथ ब्लैकमेल होने वाले भ्रष्ट की भी बात करें, तभी बात कुछ जमेगी
 
खुद पढ़िए बड़बोले उस्मान के बोल बचन 

( उर्वशी शर्मा )
मोबाइल ८०८१८९८०८१



 


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GoI notifies new SC/ST Prevention of Atrocities Rules in line with recent amendments to the SCSTPOA-Act [2 Attachments]

Dear all,
The Central Government has notified amendments to the Rules made under the SC/ST Prevention of Atrocities Act, 1989 as amended by Parliament in 2015. New offences have been recognised for punishment when committed against members of the SC/St communities. New mechanisms have been established for ensuring speedy trial of such cases. The newly notified Rules give the details of this mechanism along with the scheme of granting compensation to the sufferers of such crimes. The Gazette notification of the amendments to the Rules and the Act are in the attachments. 
Please circulate this email and the attachments widely.
Thanks
Venkatesh Nayak
CHRI, New Delhi



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